Wednesday, April 30, 2008

नक्सलवाद की कहानियाँ लिखते पत्रकारों के नाम

"क्या आप ज़रा मेरी तनख्वाह बढ़वाने की बात कर सकते हैं सर? मैं इस साल भी अपनी बेटी को ठीक स्कूल में दाखिल नहीं करवा पाया. आठ सौ रुपये लग जाते."

मैं झारखण्ड में घाटशिला नाम के कसबे में था, और एक हिन्दी समाचार पत्र के स्थानीय साथी मेरे मित्र, अपने बॉस, से बेहतर पगार का निवेदन कर रहे थे.

घाटशिला के पत्रकारों की कहानी नक्सलवाद से सारे इलाकों की कहानी है. नक्सलवाद कवर करना कश्मीर जैसा चमक धमक भरा सेक्सी काम नहीं है. कम-ज़्यादा खतरे दोनों जगह हैं, लेकिन नक्सल क्षेत्र का रिपोर्टर कश्मीर के पत्रकार की तरह टनाटन कॅरिअर नहीं बना पाएगा, बड़ा मकान नहीं बना पाएगा, कार नहीं ले पाएगा, किस्मत ने साथ भी दिया तो डॉलर नहीं कमा पाएगा, और अमरीकी लहजे में बात करने वाले दोस्त नहीं बना पाएगा.

ये तो गरीब का विद्रोह है.

ये तो गरीब रिपोर्टर की कहानी है।


घाटशिला में मेरे स्थानीय साथी का दफ्तर भयानक गरम था, जैसे कमरे के अन्दर ही लू चल रही थी. सिर्फ़ एक पंखा था, धीमी रफ्तार में चलता हुआ. रौशनी कम थी. चाय की दूकान बंद थी. उनके अपने अदम्य उत्साह और मक्खी मारने के प्लास्टिक के यन्त्र के अलावा यहाँ उनके जोश को जिंदा रखने के लिए था ही क्या यहाँ.

नक्सल क्षेत्रों में काम कर रहे ये साथी इन्हीं अंधेरे कमरों से इस विद्रोह के समाचार दुनिया को देते हैं. जब गुमनाम नक्सल प्रवक्ताओं के फ़ोन आते हैं, या खूबसूरत लेखनी में लिखी प्रेस रिलीज़ कोई दे कर जाता है, ऑपरेशन के बारे में बताने के लिए. नई मौतें, नए आक्रमण, नया पुलिसिया आक्रोश.
वो मेरे साथी तब भी बिना थके चलते रहते हैं जब पुलिस उन पर नक्सली जासूस होने का आरोप लगाती है, जब उनके फ़ोन टेप होते हैं.

वो चलते रहते हैं, इसलिए नहीं की कोई तनख्वाह में बढोत्तरी या बॉस से तारीफ की ईमेल उनका इंतज़ार कर रही है. वो चलते रहते हैं क्यूंकि वो जानते हैं कि कहीं न कहीं वो भी कहानी का हिस्सा बन गए हैं. अपमानजनक गरीबी में रह रहे लोगों कि जिंदगियों से इतने जुड़ गए हैं कि अब पीठ दिखा कर कहीं जा भी नहीं सकते.

वो भारत के असली पत्रकार हैं. बरसों बरसों इन्हीं कच्चे रास्तों पर चलने के बाद भी, वही कहानियाँ बार बार लिखने के बाद भी, उनकी आँखें तब भी नम हो जाएंगीं जब वो सुनेंगे उस बूढी औरत कि कहानी जो एक रात बुरी तरह जल कर मर गयी -- क्यूँकि ओढ़ने को कम्बल नहीं था और आग के ज़्यादा पास सो गयी थी.

वो कभी कोई पत्रकारिता का पुरस्कार नहीं जीतेंगे, मोबाइल फ़ोन के नए मॉडल नहीं खरीद पायेंगे, प्रधान सम्पादक जी से तारीफ के दो शब्द नहीं सुन पायेंगे, और टीवी स्टूडियो में बैठ कर अपनी बात कहने के लिए नहीं बुलाए जाएंगे.

और जो ये सब कर पाए हैं, उनसे ये मेरे साथी कभी रंज नहीं करेंगे.

सलाम करता हूँ उन्हें.

पाठकों में अगर कोई प्रधान संपादकगण भी हों, तो कृपा कर के मेरे दोस्तों को तारीफ भरा एक फ़ोन कर दें, एक कूलर दिला दें, और थोडी सी तनख्वाह बढ़ा दें -- ताकि इस बार नए सेशन में एक साथी पत्रकार अपनी बेटी को किसी ठीक ठाक स्कूल में भरती करा पाये.

नीलेश

8 comments:

sudeep said...

नीलेश जी,

बहुत मार्के की बात कही है आपने. दरअसल तथाकथित राष्ट्रीय पत्रकारिता आपके जांबाज पत्रकार दोस्त जैसे "छोटे" पत्रकारों के बूते ही अपनी कहानियां बनाता है. पर्यटक की तरह नक्सल इलाकों, कालाहांडी और बस्तर जैसे दुर्गम क्षेत्रों में जाने वाले महानगरों के बड़े पत्रकार इन्हीं पत्रकारों की सूचनाओं के आधार पर बड़ी कहानियां बनाते रहे हैं. वाकई उन पत्रकारों की हालत दिहाड़ी मजदूरों जैसी ही है. उनके पास शब्दों की बाजागरी और महानगरीय लटके-झटके भले न हों, भले ही वे अपनी खबरों के साथ खुद की भी पैकेजिंग न कर पाते हों लेकिन उनका जीवट ही बाकी दुनिया को वहां की हकीकत से रू-ब-रू कराता है.

गौरव सोलंकी said...

आप सही कह रहे हैं नीलेश भाई। वे ही सच्चे पत्रकार हैं, जो तारीफ़ नहीं पाते, फिर भी रंज नहीं करते। हमारी या किसी प्रधान सम्पादक की इतनी औकात कहाँ कि उनके आसमान जितने हौसले से नज़रें मिलाकर बात भी कर सके।
हाँ, कूलर और स्कूल की फ़ीस दी जा सकती है।

हर्षवर्धन said...

असली-नकली पत्रकारों का भेद बड़े शहरों या छोटे कस्बों या ऐसी परिस्थितियों में काम के आधार पर करना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन, सच्चाई यही है कि ऐसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की सुध कम ही ली जाती है। कम से कम ब्लॉग के ही जरिए ऐसी चेतना जगाने की कोशिश हो। क्योंकि, बड़े शहरों के पत्रकारों(संपादकों)का बड़ा वर्ग यहां तो विचरते आता ही रहता है।

abhishek said...

badhai... sach yahi hai aur is se se bhi kadwa hai

रोशन प्रेमयोगी said...

apke sathi patrakar ke bare me padhate huye mujhe vs naipal ki book- mati mere desh ki, ki yad aa gayee. naxsal andolan se jude logon & usase prabhavit logon ka dard ek saman hai. ek patrakar ke roop me apse mulaqat new hai lekin lagati purani hai
-roshan premyogi

Navnit Nirav said...

नीलेश जी,
यह स्थिति सिर्फ पत्रकारिता जगत में ही नहीं है बल्कि कमोबेश हर विभाग की है . फिर भी में आपके प्रयास की सराहना करता हूँ की आपने झारखण्ड के घाटशिला जैसे छोटे क्षेत्र के पत्रकारों के बारे में लिखा. यदि संभव हो तो पलामू , गुमला , चतरा जैसे क्षेत्रों के पत्रकारों से भी मिलिए जो नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं .
आप के इस post के लिए धन्यवाद्.
नवनीत नीरव

preeti said...

कैमरे की चकाचौंध में बाजारू और मनोरंजक होने की और अग्रसर पत्रकारिता और पत्रकारों की दुनिया में असल पत्रकारों और असल पत्रकारिता से रूबरू करने के लिए सलाम .वैसे अब देश में जैसे हिंदी हाशिये में है ..हिंदी भाषी पत्रकार भी ..छोटे जिलों और कस्बों में तो और बुरा हाल है ..

Sanjiv Kavi said...

बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर

सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !

आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब

केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।

विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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