Wednesday, October 15, 2008

दो बेवकूफ औरतें

मेरे दोस्त कहते हैं मैं अक्सर महिलाओं के ख्याल में रहता हूँ. सच कहते हैं.


देखो ना -- हफ्तों बीत गए. जाने कब फूटा था अहमदाबाद में बम. जाने कब आयी थी बिहार में बाढ़. फिर भी दो औरतों को अपने साथ लिए घूम रहा हूँ. पीछा ही नहीं छोड़तीं कमबख्त.



एक तो मर भी चुकी है.


फल के ठेले के पास खड़ी थी, पीली साड़ी पहन कर. अमरुद ले रही थी. दाहिने हाथ में प्लास्टिक की थैली थी. बाएँ हाथ में कुछ छोटे नोट दबाये थी. ठेले पर सेब भी थे, अनार भी. लेकिन अमरुद सस्ता होता है न.

अमरुद लिया नहीं, कि बम फट गया. धडाम से गिर पड़ी मुई, पीठ के बल, उसी अहमदाबाद के बाज़ार में. आतंकवादी ने किसी छोटे से कमरे में बैठ के जो बनाया था, उस बम से निकले पतले पतले लोहे के टुकड़े उसके बदन को चीर गए.




फल वाला भी मर गया. बेकार में रुपैय्या रुपैय्या भाव ताव करता था, अब पता चला ना, आटे दाल का भाव.

और वो पीली साड़ी वाली औरत ... कौन जाने उसके मुंह से कुछ निकला होगा कि नहीं. "आssssssssss" बोली होगी क्या? सर जब ज़मीन से लड़ा तो धमक लगी होगी क्या या तब तक मर गयी होगी?

थैली से अमरुद बिखर गए, फैल गए दूर तक.

अक्सर सोचता हूँ उसके बारे में.

कौन पीछे उसकी राह देखता होगा उस शाम? किस गाँव की कितनी घोर गरीबी छोड़ कर उसका परिवार शहर आया होगा, ताकि क़र्ज़ से फांसी न लगानी पड़े ...

किस से कह कर आयी होगी "बस अभी आयी बेटा, अमरुद लाने जा रही हूँ"? कौन नाराज़ होता होगा, "इत्ती देर हो गयी, अमरुद लाने में इत्ती देर लगती है क्या?"

सच बात है. अमरुद लाने में इत्ती देर कहाँ लगती है. हाँ, मरने में थोड़ा वक्त ज़रूर लग जाता है. धीमी धीमी मौत मरते हैं ना इस मुल्क के करोड़ों लोग.

अहमदाबाद के उस बाज़ार से सैकडों मील दूर, बिहार के मधेपुरा जिले के लखीपुरा गाँव में रहती है दूसरी औरत.

मरी नहीं है अभी. हाँ मरने चली थी उस रोज़.

गाँव आयी रक्षा नाव वापस जाने को थी, खाना बाँट कर. नैशनल डिसास्टर रेस्पोंस फोर्स के कमांडेंट डैनियल अधिकारी के पास खाने का आख़री थैला बचा था, और सारा गाँव भूखा था. जैसे ही थैला हवा मैं उछला, वो पागल औरत पानी में कूद गयी. पेट जो भरना था परिवार का.







मर सकती थी. लेकिन भूख से मरने से तो ज़्यादा इज्ज़तदार होती ये मौत.

थैली उसके हाथ में आयी क्या, एक और आदमी कूद गया पानी में. लड़ते रहे वो कितनी देर तक.

मुझे इस कहानी का अंत नहीं मालूम है. पता नहीं उस पागल औरत के घर उस दिन रोटी बनी या नहीं. क्या पता अब तक जिंदा भी है या मर गयी अगली नाव की राह देखते देखते.


पर अक्सर दिल्ली में लाल बत्ती हो जाती है, तो गाड़ी में बैठा बैठा भीख मांगने वाले बच्चों को देख कर सोचता हूँ -- अगर उन दो औरतों के बच्चे कभी भटकते हुए आमने सामने मिल गए तो पता है क्या बोलेंगे एक दूसरे से?


"माँ तो कभी घर से मत निकलने देना ..."

(चित्र: इन्टरनेट/कमांडेंट डैनियल अधिकारी, एन डी आर ऍफ़ )

24 comments:

शायदा said...

ऐसी ही कई औरतें और कई इंसान....बच्‍चे भी हम सबके ज़मीर पर सवाल दागते रहते हैं। हां हम सफल हो जाते हैं उन सवालों से कन्‍नी काट सकने में, कभी अपने दुखों को अपनी जिंदगी से भी बड़ा बनाकर तो कभी उनके सवालों को बहुत छोटा बताकर। जिंदगी चलती रहती है क्‍योंकि हम उसे चलाना चाहते हैं बिना किसी रुकावट के। बहुत अच्‍छा लिखा आपने, जो सवाल मुश्किल से पीछे धकेले थे फिर से सानमे आ खड़े हुए हैं..।

सचिन मिश्रा said...

papi pet ke liye kya kuch nahi karna pdta hai.

Udan Tashtari said...

बहुत भावुक कर देने वाली पोस्ट है.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

:-(((
- लावण्या

Priyankar said...

बहुत मुश्किल से पढ़ सका . बार-बार आंखें डबडबा आती थीं . और क्या लिखूं !

Anonymous said...

such thought provoking words...

ravishndtv said...

अच्छा किय तुमने लिख दिया। अब ये दोनों औरतें मेरा पीछा करेंगी। अपने बच्चों को किसी लाल बत्ती पर छोड़ कर।

Rahul Pandita said...

This reminds me of Dushyant Kumar's lines: Ho gayi har ghat pur poori vyavastha, shauk se doobe jisse bhi doobna hai. A very touching post, indeed.

गिरीन्द्र नाथ झा said...

अब दोनों औरतें हम सभी का पीछा करेगी और जब इनके बच्चे मिलेंगे तो जरूर पूछेंगे ---घर से क्यूं निकली थी मां.............

Quixotic said...

This one is really disturbing picture and the event. How do we end this?

Here is something that was told to me "off the record" 2 days before the Bihar flood consulate general of Nepal met many ministers including a top and very much loved one from Bihar.

Any guess why he was doing that?

Anonymous said...

watching all this horrible and disturbing scene on your blog and the poetic description of tragedy of Madhepura is too heart breaking to bear.
I ask you that why all this is being made the blog item? did you dare to wet your feet into the flood water of kosi? how many victims have so far been paid plenty monitory assistance by you? in the blog photo you look to be belonging to a prosporous family. If all this is just a report of a correspondance, then it is nothing more than the commercial use of the national calamity. For the sake of pity people please stop all this tear dropping and if possible take some real steps for their rehabilitation.

Aditya said...

Since I was one of those who dropped tears after reading the story, I will take the liberty to respond to the anonymous post above.

I believe words are more powerful than money. And this is how changes happen. I am one of those who has not seen a real flood and this level of crisis for food. After reading the post I realized how bad it could get.

Did I make a contribution to Bihar? Yes I did. But ofcourse I will not write a blog to say that I made a contribution. I would have not made a contribution unless I had actually read this blog by the author and realized how bad it was. Perhaps Neelesh's words created some more people like you and me who came forward with contributions - whatever little they could.

That said, what if I did not make a contribution? I am a tax payer and I think its the Government's responsibility to be in a position to address such calamities. Unfortunately, our Governance has proved time and again that we are not yet mature to face such situations. We cannot even provide food to our prople when they need.

Take it with a pinch of salt. Your money and my money will not help when Prime Minister has declared this a national disaster and spent over Rs. 1,000 crore for relief.

Thanks Neelesh for showing the courage to visit Bihar and sharing these facts with us.

Neelashi said...

I luv ur blog caption and ur titles..its a very well composed piece of your mind.
you brought about reality without using brutal words, or being entangled with descriptions, yet you conveyed it to the core.
that's a very big achievement.

Irshad said...

ये नीलेश कौन है, कहां रहता है, क्या खाता है। कैसी-कैसी बातें करता है ये। आदमीयों की भीड़ जिन्हे है अपने काम से काम, उनमें कैसे रह लेता है यह इंसान। दर्द के जिम्मे की गठरी को सम्भाले कब तक चलेगा देखेगे हमसब।

Manish Bhatt said...

Nishabd

Onkar said...

Very well-written piece. It proves that one single write-up can convey much more than many lengthy reports.

indianrj said...

Do we deserve to be called "HUMAN"?

Bahadur Patel said...

bahut thik likha hai.

Rajesh Roshan said...

thought provking post. amrud to saste hote hi hain....Bharat ke logo ki jaan usse bhi sasti hoti hai.... Ha India mein jaan ki kimat 750 sansad mein baithne wale logo se jananna chahiye... Shhh.

sunshine said...

Beautiful is an understatement. I believe all journalists have the power to change public opinion by such thought provoking writing. Let's just be honest. And it will show.

arvind said...

andar tak jhkjor dene wali story hai... itne simpal sabdo me itni gahraayi kha se laate hain aap?

aanshu said...

NILESH JI, AAP NE SAI LIKHA HAI, MERE PAAS SABD NAHI HAIN KI AAP KI TAREEF KARU, AAP INSHANO KE DIL KI GAHRAYION TAK JAATE HAI SAAB, YE POSTS PADH KE AANKBHAR AATI HAI AUR APN OOPER SHARM MAHSOOSH HOTI HAI, KI KYA HUM SAB YE ZINDAGI BHAR DKKHTE HI RAHENGE, KYA IN LOGO KE LIYE KUCHH KAR PAYENGE SAYAD NAHI.........

prakhar said...

ha!!!!! such a nica comment

ankita singh said...

... mile shayad un dono aurton ke bachche ladte jhagadte ek roti ke tukde ke liye..

(All photos by the author, except when credit mentioned otherwise)