Thursday, February 24, 2011

यादों की पहेली को




यादों की पहेली को
कुछ इस तरह सुलझाओ
बूझो तो बूझ जाओ
वरना भुलाते जाओ

तुमने भुला दिया है
इतना यकीन है पर
मैंने भुला दिया है
इसका यकीं दिलाओ

मुझे छोड़ के गए तुम
सब ले गए थे क्यूँ तुम
इतना रहम तो कर दो
इक घाव छोड़ जाओ

कुछ नफरतें पड़ी हैं
कहीं पे तुम्हारे घर में
मेरा है वो सामां तुम
वापस मुझे दे जाओ

मेरा ग़म का खज़ाना है
तेरे पास मुस्कराहट
अपना जो है ले जाओ
मेरा जो है दे जाओ

Saturday, January 1, 2011

2011: फिर नया साल और पुराना मैं



फिर नया साल और पुराना मैं
फिर चला लेके ताना बाना मैं ...

मैंने आखिर भुला दिया है सब
तेरे सजने की कवायद की खनक
तेरी परियों की सजावट सी चमक
तेरी खामोश निगाही का सबब
तेरी दस्तक की ज़बां का मतलब
मैंने आखिर भुला दिया है सब
यूँ भी थोडा ही तुझको जाना मैं
फिर चला लेके ताना बाना मैं
फिर नया साल और पुराना मैं ...

सच तो ये है कि सच है इतना सा
आधे हम तुम थे ग़लत, आधे सही
लम्हे बिखरे थे, हमने बांधे नहीं
शाख पे दूरियों की फल आया
चख के न देखा ज़हर कितना था
सच तो ये है कि सच है इतना सा
सच से लेकिन हूँ अब डरा ना मैं
फिर चला लेके ताना बाना मैं
फिर नया साल और पुराना मैं ...

वक़्त कहता है, टूट जाऊँगा मैं
टुकड़ा इक थामे है, कालिख का है
गिर जा, हाथों पे वक़्त लिखता है
गिर के भी किरचे फिर उठाऊंगा मैं
जोड़ के खुद से खुद को लाऊंगा मैं
वक़्त कहता है, टूट जाऊँगा मैं
वक़्त की ज़िद कभी न माना मैं
फिर चला लेके ताना बाना मैं
फिर नया साल और पुराना मैं ...


मुझे है आया कहाँ प्यार का ढब
न मैंने दिल के तरीके सीखे
न ही रिश्तों के सलीके सीखे
हैं नुमाइश पे लम्हे आज भी सब
पर इन से ऊब गया जाने कब
मुझे है आया कहाँ प्यार का ढब
मुझको न देख तू, बेगाना मैं
फिर चला लेके ताना बाना मैं
फिर नया साल और पुराना मैं ...


Sunday, October 10, 2010

माफ़ करियेगा, मिर्ज़ा ग़ालिब


Friends ... For the national book tour of "The Absent State", I wrote a ghazal that is a tribute to Mirza Ghalib, and in a long-standing tradition of Urdu poetry, takes the mukhda (top two lines) of the original and rewrites the rest as a take on modern India. Many friends who heard it live have asked for the lyrics. So here goes: To be sung to the tune of Jagjit Sungh's original ...




हजारों ख्वाहिशें ऐसीं, की हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले



सुना था वक़्त की मुट्ठी में

खुशियों के खजाने हैं

तो फिर कमबख्त क्यूँ देहलीज़ पे है

रख के ग़म निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन

फिर भी कम निकले ...


बने हो रहनुमा जो तुम

तो बातें रहनुमा की हों

क़सम खाना कुछ इस तरहा

के झूठी हर क़सम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन

फिर भी कम निकले ...


सुना था किस्मतें बदलेंगी

कर लेते सबर हम भी

ज़रा सी थी ख़ुशी मांगी

ज़रा से लम्हे कम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन

फिर भी कम निकले ...


हैं तनहा हम, मगर चलते रहेंगे

देख लेना तुम

ये दुनिया भी चलेगी कल

जहाँ से आज हम निकले

बहुत हा मेरे अरमान लेकिन


फिर भी कम निकले ...


हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं की

हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन

फिर भी कम निकले ...

Tuesday, August 31, 2010

याद होगा तुम्हे ये गीत ...



मैं धूप में था, वो छांव में

मैं आसमां, वो हवाओं में

थे संग हम फिर भी दूर थे

भंवर थे दोनों के पाँव में

कभी तो वापस फिर आयेंगे

वो लम्हे ख्वाबों के गाँव में

वो खूबसूरत सी दोपहर

वो शाम संग तेरे मुक्तसर

रखा है उस पल का नाम भी

लो हमने अब तेरे नाम पर

चले भी आओ हैं ढूँढ़ते

तुम्हें हजारों दिशाओं में

कभी तो वापस फिर आयेंगे

वो लम्हे ख्वाबों के गाँव में


मैं करवटों में उलझ गया

मैं रात भर कल सो सका

मैं उस को हर पल हूँ ढूँढता

जो पल हमारा हो सका

रोको अब मैं हूँ डूबता

जाने कैसी खलाओं में

कभी तो वापस फिर आयेंगे

वो लम्हे ख्वाबों के गाँव में


हमारी तकलीफ सोच कर

था रोना चाहा, रो सका

ज़रा से मासूम ख्वाब का

गले में किरचा अटक गया

है कहने को कितना कुछ मगर

बताओ कैसे सुनाऊं मैं

कभी तो वापस फिर आयेंगे

वो लम्हे ख्वाबों के गाँव में

Tuesday, June 29, 2010

My new song

Please do hear my new song ... from "Once Upon a Time in Mumbai" ... directed by Milan Luthria, music by Pritam. The song is in three versions, this one is by one of my most favourite singers, KK.


Sunday, June 27, 2010

बस, रास्ता अब रुक गया


बस, रास्ता अब रुक गया
हम भी क़दम यूँ रोक लें
जैसे सफ़र था ही नहीं
बस वक़्त का ठहराव था
और राहें अब हैं चल पडीं ...

मैं उसका अब कुछ भी नहीं
वो मेरा अब कुछ भी नहीं
फिर भी शहर रोशन लगे
लगता अंधेरों में कहीं
उम्मीदें मेरी जल पडीं

बस वक़्त का ठहराव था
और राहें अब हैं चल पडीं ...

Saturday, June 26, 2010

बकवासपरस्ती करते हैं




चल सर से सर टकराते हैं
चल सड़क पे नोट लुटाते हैं
चल मोटे स्केच पेन से इक दिन
हम चाँद पे पेड़ बनाते हैं
जो हँसना भूल गए उनको
गुदगुदी ज़रा करवाते हैं
चल लड़की छेड़ने वालों पे
हम सीटी ज़रा बजाते हैं
इन बिगड़े अमीरजादों से
चल भीख ज़रा मंगवाते हैं
पानी में दूध मिलाया क्यूँ?
चल भैंस से पूछ के आते हैं
नुक्कड़ पे ठेले वाले से
चल मुफ्त समोसे खाते हैं
चल गीत बेतुके लिखते हैं
और गीत बेसुरे गाते हैं

क्या करना अकल के पंडों का
हमें ज्ञान कहाँ हथकंडों का?
चल बेअक्ली फैलाते हैं
चल बातें सस्ती करते हैं
बकवासपरस्ती करते हैं!
बकवासपरस्ती करते हैं!

चल तारों का बिजनेस करके
सूरज से रिच हो जाते हैं
उस पैसे से मंगल गृह पे
एक प्राइमरी स्कूल चलाते हैं
चल रेल की पटरी पे लेटे
हम ट्रेन की सीटी गिनते हैं
चल किसी गरीब के बच्चे की
सपनों की लंगोटी बुनते हैं
चल इनकम टैक्स के अफसर से
"क्यूँ है इनकम कम?" कहते हैं
मुस्कान ज़रा फ़ेंक आते हैं
वहां जिस घर में ग़म रहते हैं
चल डाल शुगर फ्री की गोली
इक मीठा पान बनवाते हैं
चल यूँ ही झगडा करते हैं
और फिर झगडा सुलटाते हैं

जो हमको समझे समझदार
उसका चेक अप करवाते हैं
चल बोरिंग बोरिंग लोगों से
बेमतलब मस्ती करते हैं
बकवासपरस्ती करते हैं!
बकवासपरस्ती करते हैं!



Friday, June 25, 2010

सोचता हूँ


सोचता हूँ कि काश तुम होते
कम से कम तन्हा ना ये ग़म होते

सोचता हूँ कि वो कैसे टूटा
क्यूँ ना जाना कि रिश्ता कांच का था
गीली मिट्टी की तरहा फिसल गया
दोष मिट्टी का था कि हाथ का था?
काश इतने सवाल ना होते
कुछ तो तकलीफज़दा कम होते

सोचता हूँ कि काश तुम होते
कम से कम तन्हा ना ये ग़म होते

सोचता हूँ कि कैसे होगे तुम
जो मिलूंगा तो क्या कहोगे तुम
जो कहूँगा, कि याद करते हो?
सच कहोगे कि चुप रहोगे तुम?
काश फिर याद के कोहरे होते
काश फिर बातों के मौसम होते

सोचता हूँ कि काश तुम होते
कम से कम तन्हा ना ये ग़म होते

Wednesday, June 23, 2010

रात से याद के काजल को



रात से याद के काजल को
मिटाऊं कैसे?
जिसका दर छोड़ दिया उस को
भुलाऊं कैसे?

तू बुरा है, मुझे ये कह के उसने छोड़ दिया
थामा उम्मीद का यूँ हाथ कि मरोड़ दिया
मैंने भी कांच से पत्थर का वो घर तोड़ दिया
रखा हथेली पे यादों का शहर, तोड़ दिया




लेकिन अब सोचता हूँ न शहर बचा न है घर
जाए जो तनहा मुसाफिर, तो अब ये जाए किधर?
इस बयाबां में अब न तू है, न मैं मिलता हूँ
अपना साया हूँ खुद को ढूँढने निकलता हूँ




तुझसे नाराज़ हूँ मैं, खुद से भी नाराज़ हूँ मैं
नाम न लेता मेरा, जैसे हसीं राज़ हूँ मैं
नाम उसका मैं फिर से होठों पे लाऊं कैसे?
रूठी उम्मीद को बोलो मैं मनाऊं कैसे?

रात से याद के काजल को
मिटाऊं कैसे?
जिसका दर छोड़ दिया उस को
भुलाऊं कैसे?


अब शहर शहर भटकता हूँ, तुझ से दूर हूँ मैं
तू ही कहती थी ना मुझसे, तेरा नासूर हूँ मैं
मुझको ना छूना तू, कि अब ज़हर में चूर हूँ मैं
मैं तो पागल फकीर हूँ, तेरा फितूर हूँ मैं
मैं तो वो ज़ख्म हूँ तेरा जो ना भरेगा कभी
मैं परिंदा हूँ जो सूरज से जल मरेगा कभी
फिर भी दो बूँद तू आंसू के ना धरेगा कभी
मुझको खोने का तू अफ़सोस ना करेगा कभी


मुझको मालूम है ये सब, है फिर भी इतना पता
सिवाय तेरे मेरे दिल में और था ही क्या?
राज़ इतना सा है, खुद से ये छुपाऊं कैसे?
छोड़ना चाहूँ तुझे, छोड़ के जाऊं कैसे?

रात से याद के काजल को
मिटाऊं कैसे?
जिसका दर छोड़ दिया उस को
भुलाऊं कैसे?

(All photos by the author, except when credit mentioned otherwise)