Friday, August 28, 2009

Life is beautiful: A Kasauli diary

I saw Mars last night. With the naked eye.

I saw a barber who works his craft with the pride of a painter or a classical singer. I saw old grandmothers laugh like schoolgirls with two plaits. I waved to the one-year-old child I meet every day on my evening walk and he got up promptly, waving his tiny hand and trying to walk towards me. I saw a rainbow far away over the hills. I saw glow worms. I heard rain.

I picked up my camera after many, many days.

I am soaking in all I can, living out all the tiny moments this small town is throwing at me, immersing myself in the cool breeze and the wayward mist that wraps me when I walk breathless up the hills. I am wading through its silences, sauntering through its British-era tranquility, a mesmerised visitor who refuses to go away.

Panting after a steep climb, sweating in the cold mountain air, my friend Rahul Pandita and I pop up again and again at the big shop next to the cantonment where the man I call "Mr. Maggi" sits emotionless, springing to life the moment we order noodles after a day of being locked up in two hotel rooms and trying to finish a long-unfinished book.

But there is something else unfinished -- take a deep breath as as you order that coffee from the machine and cringe at the cost of mineral water and sit gingerly on the dew-soaked chair in black metal. It is our own unfinished lives that we are bringing to Kasauli, pausing for a moment, taking in the pure, innocent mountain air, reflecting on our lives -- seeking answers.

Sometimes finding them. Sometimes realising there were better ways to seek them.

Life is beautifu. Why unnecessarily complicate it? The answers are right here, walking alongside the questions.

Opposite Mr. Maggi's, there is an unusual crowd today for an August weekday in Kasauli: all of six people, sitting around a metal table. An old Uncleji gets a phone call, its his daughter in some metropolis. She asks how he is. He tells her they are having a great time, met a friend and his wife, they are sitting at the same spot where their granddaughter had danced one day. She wants a phone number. Grandpa promises to SMS it to her.

I walked. Through the cobbled street along the small market. The barber clipped away in his shop with the old world charm, relentless and focussed. The halwai next door scooped out hot, steaming jalebis, thin and crisp and bursting with calories. Some distance away, a young man sat on the pavement, chiselling away a large piece of deadwood into a beautiful work of art by a nameless artist, that would soon find place in some glorious living room in some part of India.

And soon we stood in the open air expanse outside the dining hall at the Kasauli Club, I clicking away pictures of one poor tree (see main blog picture) and the pensive skies. Were they violet, or pink? Did I care?

Rahul's friend Rajesh Dogar, whose lovely hotel Kasauli Regency we are staying in, drove us there. His wife Preetie joined us. She is a geography teacher. She knows the planets.

"That's Mars!" she said.

And there it was. I was seeing a planet for the first time in the clear sky. See the picture above, its the bright spot high above the roof of the Kasauli Club and the lit-up hall of the nearby mansion.

Inside in one of the halls in the club with wood panels and stone walls, a bunch of grandmothers laughed at a girls' evening out. Some elderly gentlemen sat in a corner as well, their silence interrupted by occasional guffaws.

The waiter is called Ishwar. In June, when the club is crowded and teeming with the house owners who descend on their summer homes, some ingenious people shout: "Hey Ishwar! (O God!) Can we have our drink?"

I am not going to call out to Ishwar.

I have had my drink. I am headed back to the big city, high on life.

(Photo Credit: The rainbow picture is taken by Rahul Pandita. The rest are mine)

Wednesday, August 26, 2009

जुगनुओं के शहर से एक और ख़त

इक अजनबी है अजनबी शहर को आ गया
होटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गया

तन्हाई से मिलना हुआ कितने बरस के बाद
कमबख्त को करते रहे कितना तरस के याद
कितने ये चेहरे ओढ़ के दिल्ली में खो गयी
ख़त लिक्खे, पुकारा किये, खामोश हो गयी
इक छोटे से शहर में है शरमा के फिर मिली
"कैसे हो अजनबी?" है ये फरमा के फिर मिली
मैं क्या बताऊँ तुमको कि मैं कैसा हूँ क्या हूँ
तुम छोड़ गयीं मुझको मैं वहीँ पे खड़ा हूँ
इक याद का टुकडा मेरे घर भूल आई थीं
मैं आज ढूँढता उसी मंज़र को आ गया

होटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गया ...

अब लगता है रहता हूँ यहाँ कितने बरस से
अब रोज़ मैं तय करता हूँ जुगनू भरे रस्ते
हलकी सी सर्द है हवा, अक्सर निकलता हूँ
मैं धुंध का कम्बल लपेटे हाथ मलता हूँ
गीली सी कुर्सियों पे रोज़ चाय पीता हूँ
इक याद शुगर फ्री है, उसे घोल लेता हूँ
हैं चीनी भरी यादें भी, पर पी न पाऊंगा
इतनी मिठास ना दो मुझे, जी न पाऊंगा

तन्हाई भरे शहरों में उकता सा गया हूँ
खुद से ही ऊब कर मैं इस सफ़र को आ गया

होटल जो लौटा तो लगा कि घर को आ गया ...

चित्र साभार : इन्टरनेट (,,

Sunday, August 23, 2009

जुगनू भरे रास्ते से एक ख़त

पाँच दिन। पाँच दुनिया। कितना भाग रहा हूँ मैं।

पहले दिन द्रास में था, कारगिल से दो घंटे की दूरी पर। १९९९ का युद्धक्षेत्र। दूसरे दिन श्रीनगर में। डल झील के किनारे एक खूबसूरत होटल में असली दुनिया से बहुत दूर। तीसरे दिन दिल्ली वापस, उधार की ज़िन्दगी जीने के लिए। दफ्तर गया। फर्जी मुस्कुराया। छेड़। चुगल। डेडलाइन। चौथे दिन बंबई। अपनी फ़िल्म "सिकंदर" के प्रेमिएर में। जलसा तो बहाना था। सच में तो ख़ुद से पीछा छुडाना था। पाँचवे दिन गाड़ी से कसौली, जहाँ अभी हूँ मैं।

जीवन उथल पुथल में है। कहीं मन नहीं लगता। कब से कोई गीत नहीं लिखा। हाँ हाल में बहुत अरसे बाद गीत गाना ज़रूर शुरू किया। ग़म के गीत कमबख्त। कौन लिखते हैं इनको ये कमबख्त लोग? दोस्तों ने मेहेरबानी की है, ज़्यादा सवाल नहीं पूछते। मैं तो कभी सवाल कम, जवाब ज़्यादा, कभी सवाल ख़तम, जवाब आधा। दोस्तों की बातें बीच में काट कर कहीं और की बकने लगता हूँ। खुंदक में दो दिन लगातार बियर पी ली, ज़िन्दगी में पहली बार दो दिन लगातार। वरना अपना उसूल है, "Beer, twice a year ..."

दो दिन से कसौली में शाम को टहलने जाता हूँ। साथ में मेरा जिगरी यार राहुल पंडिता भी ही। धुंध में चलते हैं दोनों भाई। चढाई में थक जाता हूँ तो कमबख्त बैठने नहीं देता ("कमबख्त" बहुत कहने लगा हूँ क्या?) कहता है, नीलेश जी, ऐसे चर्बी कैसे घटेगी? लेकिन इस दिमाग की चर्बी का क्या राहुल मियां? जाने किस किस ग़म का मुलम्मा चढ़ गया है दिमाग में, इसकी कसरत का क्या करें?

रोज हम हांफ हांफ के उस छोटी सी मार्केट पहुँच के काफ़ी पीते हैं। धुंध में ख़ुद को डूबता महसूस करते हैं। शोर करने वाले मंहगी गाड़ियों वाले टूरिस्टों पर हँसते हैं, और उम्मीद करते हैं की जल्दी वीकएंड ख़तम हो, सब जाएँ.

होटल वापस आते आते अँधेरा हो जाता है।
जो पतला सा पहाडी रास्ता कसौली रीजेंसी तक जाता है, उस पर जुगनू भर जाते हैं. घास पर जुगनू, जैसे पड़ी रास्ते का किनारा दिखा रहे हों ताकि हम गिर न जाएँ अँधेरे में. हवा में टहलते जुगनू. ऊपर देखो तो खूबसूरत कुहरा, तनहा मुसाफिरों की तरह खड़े पेड़, हल्का अँधेरा, हल्का उजाला, उसके पीछे तारे और खुला, निश्छल आसमान ... हलकी सी ठंडक, जोर जोर से "ये जीवन है, इस जीवन का, यही है रंग रूप" गाते दो जासूस, और लगता है की यही स्वर्ग है, यहाँ कोई तकलीफ नहीं, यहाँ कोई मेरा दिल नहीं तोडेगा, यहाँ कोई ऊँगली नहीं उठाएगा ... यहीं रह जाता हूँ ...

लेकिन मुझे पता है ... ये दुनिया भी जल्दी ही छोड़नी होगी. फिर किसी और दुनिया का हो जाऊँगा. फिर छोड़ दूंगा उसे भी.
पाँच दिन। पाँच दुनिया। कितना भाग रहा हूँ मैं। किस से भाग रहा हूँ मैं?

चित्र साभार:
(All photos by the author, except when credit mentioned otherwise)